शुक्रवार, 22 जनवरी 2021

रोहिड़ा का पेड़ [Rohida tree]

 परिचय :- रोहिड़ा रेगिस्तान के क्षेत्र में पाया जाने वाला यह बहुमूल्य वृक्ष है रोहिडा राजस्थान का राज्य पुष्प है जो 31अक्टूबर 1983 को घोषित हुआ रोहिड़ा का वैज्ञानिक नाम टेकोमेला अंडू लेटा है यह पेड़ थार रेगिस्तान के अलावा शुष्क जलवायु वाले मैदानी और पहाड़ी जगह पर भी काफी संख्या में पाए जाते हैं इस पेड़ की पर्यावरण संतुलन और जैव विविधता बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका होती है इस पेड़ को मारवाड़ का सागवान कहते हैं यह पेड़ विपरीत परिस्थितियों जैसे बहुत कम वर्षा ,रेगिस्तान की भीषण गर्मी ,अधिक तापमान ,और न्यूनतम तापमान जैसी परिस्थिति को सहन करके भी जीवित रहने की शक्ति रखता है यह पेड़ औसतन 10 से 15 मीटर लंबाई में होता है इस पेड़ पर कैर की तरह साल में दो बार फूल आते हैं जो पीले, लाल और नारंगी रंग में होते हैं यह पेड़ मरूभूमि प्रसार को रोकने में कारगर सिद्ध हुआ है क्योंकि यह पेड़ विकट परिस्थितियों में भी जीवित रहने की क्षमता रखता है | 

रोहिड़े का पेड़ 

लकड़ी :- इस पेड़ की लकड़ी कठोर और मजबूत होती है| रोहिड़े के पेड़ की लकड़ी का उपयोग दरवाजो, खिड़कियों, चारपाई, फर्नीचर और कृषि यंत्रों को बनाने में किया जाता है इस पेड़ की लकड़ी मजबूती के साथ साथ टिकाऊ की होती है हालांकि इसकी लकड़ी महंगी होती है इसी तरह टिकाऊ और महंगी शीशम की लकड़ी होती है इस कारण इसको आम बोल-चाल में रेगिस्तान का शीशम भी कहते हैं

रोहिड़े की लकड़ी 

लकड़ी 

फूल :- रोहिडा पेड़ की पहचान लकड़ी के साथ-साथ इस पेड़ के आकर्षक फूलों से भी है इस पेड़ के सर्दी के मौसम में फूलों की बहार आई हुई होती है | इनके फूल मुख्य रूप से तीन रंगों में होते हैं लाल नारंगी और पीले इस पेड़ के फूल गंधहीन होते हैं और आकर्षक होते हैं इन फूलों को धार्मिक स्थलों, पर्वो, पूजा-पाठ आदि में उपयोग लिया जाता है जब इस पेड़ पर फूलों की बहार आती है तब अन्य जीव-जंतुओं का पोषण भी होता है मुख्य रूप से फूलों के रस को मधुमक्खियों, पक्षियों, कीट पतंगों, रस भक्षी जीवो द्वारा चूसा जाता है | पालतू पशुओं जैसे गाय -भैंस ,भेड़ , बकरियां ,ऊंट  आदि इस पेड़ के फूलों को बड़े चाव से खाते हैं | 

रोहिड़े के फूल 

पत्तियां :- रोहिड़े के पेड़ की पत्तियां इसकी झुकी हुई शाखाओं पर छोटी-छोटी होती हैं पत्तियां लंबी और आगे के भाग पर नुकिली होती है इस पेड़ की पत्तियां ऊपर से हरे रंग में तथा नीचे से हल्के हरे रंग में होती है इन पत्तियों को पालतू पशुओं द्वारा चारे के रूप में बड़े चाव से खाया जाता है

बीज :- इस पेड़ के जब फल लगते हैं तब उनका आकार चंद्राकार होता है इस फल के अंदर बीज बालदार होते हैं यह बीच इन बालों की वजह से रेगिस्तान में कोसों दूर हवा में उड़ कर चले जाते हैं


लाभ :- जैसा कि आपको लकड़ी और फूलों में बताया गया है की इसकी लकड़ी का मानव जीवन में आर्थिक लाभ लिया जाता है और फूलों को पालतू पशुओं के चारे के रूप में उपयोग लेते हैं रोहिड़े का पेड़ औषधि रूपों में भी लाभ देता है जैसा कि फोड़े फुंसियों में और मूत्र संबंधित रोगों में होता है| लीवर संबंधित बीमारी में रोहिड़े के पेड़ को रामबाण माना गया है रोहिड़े के पेड़ की छाल का उपयोग भी औषधियों रूपों में होता है इस पेड़ का एक महत्वपूर्ण लाभ रेगिस्तान में मिट्टी के प्रसार को रोकने में किया जाता है सरकार और वन विभाग द्वारा विभिन्न योजनाओं में इस पेड़ को ज्यादातर पनपाया जाता है

आमजन से खतरा :- रेगिस्तान के सुशोभित इस आकर्षक पेड़ का आमजन दुश्मन बना हुआ है मानव द्वारा अपने लाभ के लिए इस पेड़ की अंधाधुंध कटाई की जा रही है क्योंकि इस पेड़ की लकड़ी काफी महंगी और टिकाऊ होती हैं लेकिन लोगों द्वारा यह बात भी भूलनी नहीं चाहिए कि इस कीमती पेड़ को बचाने के लिए सरकार द्वारा कड़े नियम लागू किए हुए हैं राजस्थान वन अधिनियम 1953 में इस पेड़ को काटने, नुकसान पहुंचाने या परिवहन करने पर सजा और जुर्माने का प्रावधान है इसलिए इस पेड़ को अगर किसी मजबूरी में काटना पड़े तो सरकार से अनुमति लेकर ही काटे| 

                                                            

           दोस्तों आप द्वारा इस पेड़ के बारे में पढ़ी गई जानकारी कैसी लगी कमेंट जरूर करें इसके अलावा इस पेड़ को लेकर आपका कोई सुझाव हो तो आप कमेंट बॉक्स के माध्यम से भी कह सकते हैं तथा अपने दोस्तों को भी इस पेड़ की अहमियत बताने के लिए इस पोस्ट को शेयर जरूर करें | 

                                                   धन्यवाद एक फोरेस्टर की कलम से 

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शुक्रवार, 8 जनवरी 2021

जाल का पेड़ {Jal tree}

 परिचय :- जाल  शुष्क  जलवायु में विलुप्त के कगार पर खड़ा एक महत्वपूर्ण पेड़ है यह पेड़ अपने आप में एक जाना माना पेड़ है इसकी खासियत का एक प्रसिद्ध कारण है इस पेड़ का उल्लेख महाभारत के करणपर्व  के अध्याय 30 में श्लोक 24 में किया गया है गुरु नानक भी इस पेड़ को धूप से बचने के लिए उपयोग में लिया करते थे ऐसा गुरु नानक जन्म तिथि में वर्णन है इस पेड़ का वैज्ञानिक नाम साल्वाडोरा ओलियोडेस है इस पेड़ की लंबाई 20 से 40 फीट तक होती है तथा चौड़ाई 10 से 12 फीट की होती है इस पेड़ का तना गर्मियों में ज्यादा खुरदरा और शुष्क हो जाता है जिससे उत्सर्जन कम होता है यह पेड़ ज्यादातर शुष्क जलवायु लवणीय भूमि और बंजर भूमि पर पाया जाता है |  

जाल के पेड़ 
                                                                                                                                                                    

पत्तियां का उपयोग :- इस पेड़ की पत्तियां  का हरे और सूखे दोनों रूपों में उपयोग में लिया जाता है हरी पत्तियां मवेशियों के लिए हरे चारे के रूप में तथा सूखी पत्तियां भविष्य में चारे के लिए भंडारण के रूप में एकत्रित की जाती है इस पेड़ की घनी पत्तियां और तने के बने कोटर बहुत सारे स्थानीय पक्षियों के लिए निवास स्थान प्रदान करते हैं

जाल के पेड़ की पत्तियां 
  

फल व बीज :- जाल के पेड़ पर फरवरी से 15 मार्च के बीच छोटे-छोटे सफेद कठोर फूल लगते हैं जिनको मींझर कहते हैं यह मींझर मार्च की समाप्ति से अप्रैल माह के पहले सप्ताह तक हरे रंग में बदलकर रसदार पानी से भरकर सोयाबीन के आकार की हो जाती है अप्रैल मध्य से यह पकनी शुरू हो जाती है और चने के आकार में लाल ,पीली और बैगनी रंग में हो जाती है जिनको पीलू कहा जाता है इन दिनों मारवाड़ क्षेत्र में पीलू की बहार आई हुई होती है इन पीलू को तोड़ने के लिए महिलाएं और बच्चे डोरी से लौटा बांध कर कमर या गले में लटका कर जाल के पेड़ पर चढ़ जाते हैं इस पीलू को खाने में स्थानीय लोग जानकार होते हैं क्योंकि अनजान लोग इस फल को खाने में गलती कर बैठते हैं इस फल को खाते समय बीज को थूकना पड़ता है क्योंकि जाल का बीज मुँह में टूट जाने पर खारापन आ जाता है और एक अन्य विशेषता इस पेड़ के फल को एक-एक करके खाने से जीभ छील जाती है और मुंह में छाले बन जाते हैं इसलिए 8 से 10 दाने एक साथ खाए जाते हैं मारवाड़ के जाल के फल को देशी अंगूर कहा जाता है इसलिए यहां के स्थानीय लोग बड़े चाव से खाते हैं पके हुए फल को हल्का सुखाया जाता है और खाया जाता है जिनको कोकड़ कहा जाता है कोकड में बीज को इकट्ठा किया जाता है यह कोकड़ देशी किशमिश के रूप में खाई जाती है | 


फल (पीलू)


जाल के पेड़ का लाभ :- जाल के पेड़ की लकड़ी फर्नीचर बनाने तथा जलाने में उपयोग ली जाती है इस पेड़ की हरी टहनी को ग्रामीण क्षेत्रों में टूथब्रश के रूप में उपयोग किया जाता है इस पेड़ की पत्तियां का उपयोग मवेशियों के चारे के रूप में भी किया जाता है इस पेड़ का फल (पीलू) जिसमें विटामिन सी और कार्बोहाइड्रेड की मात्रा पाई जाती है जो शरीर के लिए लाभदायक होती है | पीलू खाने से शरीर में पानी की कमी की पूर्ति होती है और लू भी नहीं लगती है इस पेड़ के फल (पीलू) अत्यधिक मीठे और स्वादिष्ट होते हैं इस पेड़ के तने में बने कोटर में स्थानीय पक्षी मोर, तोते, चिड़िया, जंगली बिल्ली, कोयल आदि के निवास स्थान होते हैं इसके अलावा जाल के पेड़ का उपयोग कई रोगों में औषिधीय के रूप में किया जाता है 

पेड़ 


English translate
 :- Introduction: - The jal is an important tree standing on the verge of extinction in teaching climate. This tree is a well-known tree in itself. It is a famous reason for its specialty. This tree is mentioned in verse 24 in chapter 30 of Karanaparva of Mahabharata. Guru Nanak also used this tree to avoid sunlight. It is described in Guru Nanak's date of birth that the scientific name of this tree is Salvadora oliodes. The length of this tree is 20 to 40 feet and width is 10 to 12 feet. The stem of this tree is more rough and dry in summer due to which the emission is less. This tree is found mostly on dry climate saline land and wastelands. 

Jal tree

Use of husbands: - The leaves of this tree are used in both green and dry forms. Green leaves are collected as green fodder for cattle and dry leaves are collected as storage for fodder in future. Cottages made of thick leaves and stem provide habitat for many local birds. 

Fruits and seeds: - Small white hard flowers are planted on the trap tree between February to March 15, which is called Meinjhar. This Meenjhar is changed from green to juicy from the end of March to the first week of April, filled with juicy water, the size of soybean. It starts to ripen from mid-April and becomes red yellow and purple in the shape of gram which is called yellow. These days, there is a spurt of peel in Marwar region to break these peelu. Women and children return from the rope and hang on the waist or neck and climb on the trap tree, the locals are knowledgeable in eating this peelu because unknown people make mistake in eating this fruit while eating this fruit in the middle. Spitting occurs because salinity breaks when the seed of the trap breaks in the mouth and another feature is that eating the fruit of this tree one by one peels the tongue and causes blisters in the mouth, so eat 8 to 10 grains at once. The fruit of Marwar's net is called native grapes, so the locals here eat with great fervor, the ripe fruit is lightly dried and eaten. Those are called kokad, the seeds are collected in kokkad, this kokad is eaten as native cultivar.

Fruits

Benefits of Jal tree: - The wood of jal  tree is used for making furniture and burning green branch of this tree is used as a toothbrush in rural areas. The leaves of this tree are used as fodder for cattle. Also, fruit of this tree is peelu, which contains vitamin C and carbohydrate, which helps to meet the lack of water in the body. Eating peelu does not cause sunstroke. From the trunk of this tree, the Kotar is the habitat of the local bird peacock, parrot, bird, wild cat, cuckoo etc. Apart from this the trap tree is used as a medicinal in many diseases.      

                                                                                                       Thank you......  

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सोमवार, 21 दिसंबर 2020

कुमट (अकेशिया सेनेगल ) KUMAT(ACACIA SENEGAL)

परिचय:-  यह राजस्थान के पश्चिम क्षेत्र के मरुस्थल में पाया जाने वाला अकेशिया प्रजाति का पौधा इसका वानस्पतिक नाम अकेशिया सेनेगल  है यह राजस्थान के मरुस्थल क्षेत्र में उपयोगी पेड़ है जिनसे लोगों को कई प्रकार से आर्थिक लाभ होता है | यह एक मध्यम प्रकार का पेड़ है जिनकी ऊंचाई 5 -6 मीटर होती है | इस पेड़ की घनी शाखाएँ और छोटी-छोटी सघन पत्तियाँ होती है ,यह पेड़ कांटेदार होता है, इस लिए रेगिस्तान में आसानी से पनपता है | इस पेड़ की लकड़ी,पत्ते,बीज और इसके तने से निकलने वाला गाढ़ा पदार्थ (गोंद) आदि इस पेड़ के उपयोगी पदार्थ है |                                                                                                                                            

                                                                                                                                                                        
कुमट का पेड़ 
             

                            


फल व बीज:- जब सर्दी का मौसम शुरू होता है तब इस पेड़ पर सफेद रंग के फूल लगने शुरू होते है जिनको  मींझर कहते है जब इन्ही मींझरो से हरी फली बनती है, यही फलिया जनवरी-फरवरी में पक जाती है|इन्ही फलियों को झाड़कर अंदर से बीजो को निकाला जाता है , इनके बीज चिकने गोल होते है बीजो को हलारिया कहा जाता है |                                                                                                                                     


                                                                                                                                                            
                                                    कुमट  के पेड़ पर लगी हुई फलिया 


बीजों का उपयोग:- जब इस पेड़ के बीज हरी फलियों में होते है तब इन फलियों को पशुओं के चारे के रूप में       उपयोग किया जाता है | जब फलियां सुख जाती है , तब इन फलियों को झाड़कर इनके बीज निकाल दिए जाते है| फिर इनके बीजों को उबालकर सब्ज़ी बनाई जाती है |इनके बीजो से एक अन्य रूप में भी सब्जी बनाई जाती है जैसा की बीजों को उबालकर सूखा दिया जाता है फिर गर्मियों में इन उबले सूखे बीजों को पुन: उबालकर सब्ज़ी बनाई जाती है, जो काफी स्वादिष्ट होती है | इनके उबले बीजों को राजस्थानी सब्ज़ी कढ़ी में भी डाला जाता है | कहा  जाता है कि कुमट के बीजों की सब्जी खाने से घुटनों के दर्द में राहत मिलती है | एक जानकारी के अनुसार इनके बीजों में प्रोटीन की मात्रा चने के मुकाबले दुगुनी मात्रा में पायी जाती है | कुमट  के बीजों में जिंक और फॉस्फोरस की मात्रा भी काफी पाई जाती है जो हमारे शरीर के लिए काफी लाभदायक है |                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                  उबले हुए कुमट  के बीज (हलारिया ) 

लकड़ी:- कुमट  के पेड़ की लकड़ी को कृषि औजार बनाने के उपयोग में ली जाती है | इसके अलावा इस पेड़ की    लकड़ी को जलाने में उपयोग लिया जाता है  

     

 
                                                                           लकड़ी 

   

गोंद:- इस पेड़ से एक उपयोगी पदार्थ का उत्पादन होता है जिसका नाम गोंद है | यह इस पेड़ के तने से निकलने  वाला एक गाढ़ा पदार्थ होता है , जिसका उपयोग आयुर्वेदिक औषधियों में किया जाता है | इसके अलावा इसका उपयोग महिलाओं के द्वारा लड्डु बनाने में किया जाता है | गोंद के लड्डु खाने से गर्भवती महिलाओं के दूध में बढ़ोतरी होती है, रीढ़ की हड्ड़ी भी मजबुत होती है | किसी के शरीर में टूटी हड्ड़ी के रिकवर होने में गोंद के लड्डु लाभदायक होते है | कुमट  के पेड़ के तने पर एक मध्यम दूरी पर कुल्हाड़ी से खरोंच देने पर उस जगह गोंद का उत्पादन तेजी से होता है , इस गोंद का गाढ़ा घोल बनाकर बेचा जाता है जिसका उपयोग कागज चिपकाने में भी किया जाता है | 

        

                                                                     कुमट  का गोंद   
       
        


English Translation :-    Introduction : - This is the plant of Acacia species found in the desert area of ​ the western region of Rajasthan, its botanical name is Acacia Senegal. It is a useful tree in the desert region of Rajasthan, which benefits people in many ways. It is a medium type tree whose height is 5 -6 m.This tree has thick branches and small dense leaves, this tree is thorny, so it grows easily in the desert. The wood, leaves, seeds and thick substance (gum) coming out of its stem are useful substances of this tree.

 Fruits and seeds: -When the winter season starts, then white flowers start to appear on this tree, which is called Meenjhar. When green pods are formed from these meenjhar, the same fruit ripens in January-February. The seeds are removed from inside these pods, their seeds are smooth round, their seeds are called halariaya 


                                                              View of Kumut trees


 Use of seeds : - When the seeds of this tree are in green beans, then these beans are used animal  feed. When the beans are dried, then the seeds are removed from the pods. Then their seeds are boiled and made into vegetables. Another vegetable is also made from their seeds, as the seeds are boiled and dried. It happens. Their boiled seeds are also put in Rajasthani vegetable curry. It is said that eating vegetable of kumut seeds relieves knee pain. According to one information, the amount of protein in their seeds is twice as much as gram. There is also a lot of zinc and phosphorus in the seeds of kumut,  which is very beneficial for our body.

 

Wood : - The wood of kumut tree is used for making agricultural implements. Also the wood of this        tree is used to burn



Gum : - This tree produces a useful substance called gum. It is a thick substance originating from the trunk of this tree, which is used in Ayurvedic medicines. Apart from this, it is used by women to make laddus. Eating gum laddus increases the milk of pregnant women, it also strengthens the spinal cord. Gum ladders are beneficial in recovery of broken bone in one's body. Gum is produced rapidly when scratched with an ax at a trunk of a kumut tree, this glue is sold by making a thick solution which is also used in pasting paper.


                                  Youtube:-  https://www.youtube.com/c/AajadParinda

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